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mahabharat 15.38.18-19h: सहदेव मेरी माता को उनके सभी पुत्रों से अधिक प्रिय थे; किन्तु माद्री का वह वीर पुत्र भी उन्हें उस विपत्ति से न बचा सका।   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  15.38.18-19h 
सहदेव: प्रियस्तस्या: पुत्रेभ्योऽधिक एव तु॥ १८॥
न चैनां मोक्षयामास वीरो माद्रवतीसुत:।
 
 
अनुवाद
सहदेव मेरी माता को उनके सभी पुत्रों से अधिक प्रिय थे; किन्तु माद्री का वह वीर पुत्र भी उन्हें उस विपत्ति से न बचा सका।
 
Sahadev was dearer to my mother than all her sons; but even that brave son of Madri could not save her from that calamity. 18 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)