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mahabharat 15.38.16-17h: मैं सोचता हूँ कि मेरी माता कुन्ती, जिनका शरीर इतना दुर्बल था कि फैली हुई नसें और धमनियाँ भी स्पष्ट दिखाई देती थीं, अग्नि का महान भय उत्पन्न होने पर भयभीत होकर "हे पिता! हे धर्मराज!" चिल्लाने लगी होंगी।   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  15.38.16-17h 
मन्ये पृथा वेपमाना कृशा धमनिसंतता॥ १६॥
हा तात! धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभये।
 
 
अनुवाद
मैं सोचता हूँ कि मेरी माता कुन्ती, जिनका शरीर इतना दुर्बल था कि फैली हुई नसें और धमनियाँ भी स्पष्ट दिखाई देती थीं, अग्नि का महान भय उत्पन्न होने पर भयभीत होकर "हे पिता! हे धर्मराज!" चिल्लाने लगी होंगी।
 
I think that my mother Kunti, whose body was so weak that even the dilated veins and arteries were clearly visible, must have started crying out in fear, "Oh father! Oh Dharmaraj!" when the great fear of the fire arose. 16 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)