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mahabharat 15.38.12-13h: जो अग्निदेव एक बार ब्राह्मण का वेश धारण करके अर्जुन से भिक्षा माँगने आए थे, उन्हीं अग्निदेव ने अर्जुन की माता को भस्म कर दिया। अग्निदेव को धिक्कार है! अर्जुन को उसकी सत्यनिष्ठा पर धिक्कार है!॥12 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  15.38.12-13h 
यत्रादहत् स भगवान‍् मातरं सव्यसाचिन:।
कृत्वा यो ब्राह्मणच्छद्म भिक्षार्थी समुपागत:॥ १२॥
धिगग्निं धिक् च पार्थस्य विश्रुतां सत्यसंधताम्।
 
 
अनुवाद
जो अग्निदेव एक बार ब्राह्मण का वेश धारण करके अर्जुन से भिक्षा माँगने आए थे, उन्हीं अग्निदेव ने अर्जुन की माता को भस्म कर दिया। अग्निदेव को धिक्कार है! अर्जुन को उसकी सत्यनिष्ठा पर धिक्कार है!॥12 1/2॥
 
The same Agnidev who had once come to Arjuna in the guise of a Brahmin to beg alms, burnt Arjuna's mother to ashes. Shame on Agnidev! Shame on Arjuna for his well-known commitment to truth!॥12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)