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mahabharat 15.38.1: युधिष्ठिर बोले, 'हे प्रभु! यह बड़े दुःख की बात है कि हम जैसे मित्रों के होते हुए भी घोर तपस्या में लीन महान धृतराष्ट्र अनाथ की भाँति मर गये।   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  15.38.1 
युधिष्ठिर उवाच
तथा महात्मनस्तस्य तपस्युग्रे च वर्तत:।
अनाथस्येव निधनं तिष्ठत्स्वास्मासु बन्धुषु॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, 'हे प्रभु! यह बड़े दुःख की बात है कि हम जैसे मित्रों के होते हुए भी घोर तपस्या में लीन महान धृतराष्ट्र अनाथ की भाँति मर गये।
 
Yudhishthira said, 'O Lord! It is very sad that despite having friends like us, the great Dhritarashtra, who was engaged in severe penance, died like an orphan.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)