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mahabharat 15.36.35-36h: 'यह देखकर अब मैं धन के लिए नहीं, केवल धर्म पालन के लिए यहाँ रहना चाहता हूँ। आप हम सब पर कृपा दृष्टि रखें; क्योंकि अब आपके दर्शन हमारे लिए कठिन हो जाएँगे। क्योंकि राजा धृतराष्ट्र अब अत्यन्त कठिन एवं असहनीय तपस्या आरम्भ करेंगे।'॥35 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 15.36: व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 36: व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना  »  श्लोक 35-36h
 
 
श्लोक  15.36.35-36h 
यद् दृष्ट्वा स्थातुमिच्छामि धर्मार्थं नार्थहेतुत:।
शिवेन पश्य न: सर्वान् दुर्लभं तव दर्शनम्॥ ३५॥
अविषह्यं च राजा हि तीव्रं चारप्स्यते तप:।
 
 
अनुवाद
'यह देखकर अब मैं धन के लिए नहीं, केवल धर्म पालन के लिए यहाँ रहना चाहता हूँ। आप हम सब पर कृपा दृष्टि रखें; क्योंकि अब आपके दर्शन हमारे लिए कठिन हो जाएँगे। क्योंकि राजा धृतराष्ट्र अब अत्यन्त कठिन एवं असहनीय तपस्या आरम्भ करेंगे।'॥35 1/2॥
 
‘Seeing that, I now want to stay here only for the sake of fulfilling Dharma, not for money. You should look at all of us with a benevolent eye; because your darshan will now become difficult for us. Because King Dhritarashtra will now start a very tough and unbearable penance.’॥ 35 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)