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mahabharat 15.36.25-26: यह सुनकर गांधारी बोली, 'पुत्र! ऐसी बातें मत कहो। मैं जो कहती हूँ, उसे सुनो। यह समस्त कुरुवंश तुम्हारे अधीन है। मेरे ससुर का जीवन भी तुम्हारे अधीन है; अतः हे पुत्र! तुम जाओ, तुमने हमारे लिए जो कुछ किया है, वह पर्याप्त है। तुमने हमारा अच्छा स्वागत किया है। इस समय महाराज जो आज्ञा दें, वही करो; क्योंकि पिता की बात मानना ​​तुम्हारा कर्तव्य है।'॥ 25-26॥   |   mahabharat अध्याय 15.36: व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 36: व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  15.36.25-26 
तमुवाचाथ गान्धारी मैवं पुत्र शृणुष्व च।
त्वय्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे॥ २५॥
गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत् पूजिता वयम्।
राजा यदाह तत् कार्यं त्वया पुत्र पितुर्वच:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर गांधारी बोली, 'पुत्र! ऐसी बातें मत कहो। मैं जो कहती हूँ, उसे सुनो। यह समस्त कुरुवंश तुम्हारे अधीन है। मेरे ससुर का जीवन भी तुम्हारे अधीन है; अतः हे पुत्र! तुम जाओ, तुमने हमारे लिए जो कुछ किया है, वह पर्याप्त है। तुमने हमारा अच्छा स्वागत किया है। इस समय महाराज जो आज्ञा दें, वही करो; क्योंकि पिता की बात मानना ​​तुम्हारा कर्तव्य है।'॥ 25-26॥
 
Hearing this, Gandhari said, 'Son! Do not say such things. Listen to what I say. This entire Kuru clan is under your control. Even the life of my father-in-law is dependent on you; therefore, son! You go, whatever you have done for us is enough. You have welcomed us well. At this time, do whatever Maharaja is ordering; because it is your duty to obey your father's words.'॥ 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)