श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 35: व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  15.35.6 
सौतिरुवाच
इत्युक्तवचने तस्मिन् नृपे व्यास: प्रतापवान्।
प्रसादमकरोद् धीमानानयच्च परीक्षितम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
सौति कहते हैं - जब राजा जनमेजय ने ऐसा कहा, तब परम तेजस्वी और बुद्धिमान ऋषि व्यास ने उन पर भी दया की और राजा परीक्षित को यज्ञभूमि में बुलाया ॥6॥
 
Sauti says - When King Janamejaya said this, the most glorious and intelligent sage Vyas showed mercy on him too. He called King Parikshit to the sacrificial ground. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)