श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 35: व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  15.35.4-5 
जनमेजय उवाच
ममापि वरदो व्यासो दर्शयेत् पितरं यदि।
तद्रूपवेषवयसं श्रद्दध्यां सर्वमेव ते॥ ४॥
प्रियं मे स्यात् कृतार्थश्च स्यामहं कृतनिश्चय:।
प्रसादादृषिमुख्यस्य मम काम: समृध्यताम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले- ब्राह्मण! यदि कृपालु भगवान व्यास मुझे मेरे पिता के उसी रूप, वेश और अवस्था में दर्शन कराएँ, तो मैं आपकी बताई हुई सभी बातों पर विश्वास कर सकूँगा। उस अवस्था में मेरी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी और मुझे दृढ़ निश्चय प्राप्त हो जाएगा। इससे मेरा परम प्रिय कार्य सिद्ध हो जाएगा। आज महर्षि व्यास के आशीर्वाद से मेरी भी मनोकामना पूर्ण हो।
 
Janamejaya said-Brahmin! If the benevolent Lord Vyasa shows me my father in the same form, attire and condition, then I can believe in all the things you have told me. In that condition, I will be fulfilled and will get a firm resolve. This will accomplish my most beloved task. Today, with the blessings of the great sage Vyasa, my wish should also be fulfilled.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)