सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठात् स राजा जनमेजय:।
पूजयामास तमृषिमनुमान्य पुन: पुन:॥ १७॥
अनुवाद
सौति कहते हैं:- शौनक! महाब्राह्मण आस्तिक के मुख से यह बात सुनकर राजा जनमेजय ने महर्षि व्यास का बार-बार पूजन और सत्कार किया॥ 17॥
Sauti says:- Shaunak! On hearing this from the mouth of the great Brahmin Aastik, King Janamejaya worshipped and honoured the great sage Vyasa again and again.॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)