श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 35: व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  15.35.16 
ये च पक्षधरा धर्मे सद्‍वृत्तरुचयश्च ये।
यान् दृष्ट्वा हीयते पापं तेभ्य: कार्या नमस्क्रिया॥ १६॥
 
 
अनुवाद
अब तुम उन महात्माओं को नमस्कार करो जो धर्म में तत्पर हैं, सदाचार में रुचि रखते हैं और जिनके दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं ॥16॥
 
You must now salute those great souls who are devoted to Dharma, who are interested in following good conduct and whose mere sight destroys sins. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)