श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 35: व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  15.35.12 
आस्तीक उवाच
ऋषिर्द्वैपायनो यत्र पुराणस्तपसो निधि:।
यज्ञे कुरुकुलश्रेष्ठ तस्य लोकावुभौ जितौ॥ १२॥
 
 
अनुवाद
आस्तिक ने कहा - कुरुकुलश्रेष्ठ! राजन! जिसके यज्ञ में तप के भंडार, प्राचीन ऋषि महर्षि द्वैपायनव्यास उपस्थित हैं, उसकी दोनों लोकों में विजय होती है।
 
The believer said – Kurukula Shrestha! Rajan! In whose yagya the ancient sage Maharishi Dwaipayanavyas, the treasure of penance, is present, he has victory in both the worlds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)