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mahabharat 15.35.11: आस्तिकजी! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मेरा यह यज्ञ अनेक प्रकार के आश्चर्यों का केन्द्र बन रहा है; क्योंकि आज मेरे पिता भी यहाँ पधारे हैं, जिन्होंने मेरे दुःखों का नाश किया है॥11॥   |   mahabharat अध्याय 15.35: व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 35: व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  15.35.11 
आस्तीक विविधाश्चर्यो यज्ञोऽयमिति मे मति:।
यदद्यायं पिता प्राप्तो मम शोकप्रणाशन:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
आस्तिकजी! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मेरा यह यज्ञ अनेक प्रकार के आश्चर्यों का केन्द्र बन रहा है; क्योंकि आज मेरे पिता भी यहाँ पधारे हैं, जिन्होंने मेरे दुःखों का नाश किया है॥11॥
 
‘Aastikji! It seems to me that this yagya of mine is becoming the center of many kinds of wonders; because today my father, who has destroyed my sorrows, has also come here.’॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)