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mahabharat 15.34.9: भूत, इन्द्रिय आदि नाना प्रकार के पदार्थ शरीर को प्राप्त होकर एकत्व को प्राप्त हो गए हैं। जो योगीजन शरीर को आत्मा से पृथक जानते हैं, उनके लिए वे सब पदार्थ नित्य आत्मा के स्वरूप हो जाते हैं। 9॥   |   mahabharat अध्याय 15.34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  15.34.9 
नानाभावास्तथैकत्वं शरीरं प्राप्य संहता:।
भवन्ति ते तथा नित्या: पृथग्भावं विजानताम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
भूत, इन्द्रिय आदि नाना प्रकार के पदार्थ शरीर को प्राप्त होकर एकत्व को प्राप्त हो गए हैं। जो योगीजन शरीर को आत्मा से पृथक जानते हैं, उनके लिए वे सब पदार्थ नित्य आत्मा के स्वरूप हो जाते हैं। 9॥
 
Various types of things like ghosts, senses etc. have attained unity after attaining the body. For those yogis who know the body as separate from the soul, all those things daily become the form of the soul. 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)