श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  15.34.6 
अनायासकृतं कर्म सत्य: श्रेष्ठ: फलागम:।
आत्मा चैभि: समायुक्त: सुखदु:खमुपाश्नुते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
कर्तापन के अभिमान से रहित होकर, सहज भाव से किए गए कर्म से जो फल प्राप्त होता है, वही सत्य और श्रेष्ठ है, अर्थात् मुक्तिदायक है। कर्तापन और परिश्रम के अभिमान से बंधा हुआ जीवात्मा सुख-दुःख का अनुभव करता है। 6॥
 
The result that is obtained from the work done spontaneously, without pride of doing, is true and best, that is, it is liberating. The soul, bound by pride of doing and hard work, experiences happiness and sorrow. 6॥
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