श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  15.34.3 
इत्युक्त: स द्विजश्रेष्ठो व्यासशिष्य: प्रतापवान्।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठस्तं नृपं जनमेजयम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उनके ऐसा कहने पर व्यासजी के शिष्य तथा वक्ताओं में श्रेष्ठ महाब्राह्मण वैशम्पायन ने राजा जनमेजय से कहा।
 
On his saying this, the great Brahmin Vaishmpayana, the disciple of Vyasa and the best among speakers, said to King Janamejaya.
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