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mahabharat 15.34.2: प्रसन्न होकर उन्होंने अपने पुनर्जन्म के विषय में संदेह प्रकट किया और कहा, 'जो लोग शरीर त्याग चुके हैं, वे उसी रूप में कैसे देखे जा सकते हैं?'॥2॥   |   mahabharat अध्याय 15.34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  15.34.2 
अब्रवीच्च मुदा युक्त: पुनरागमनं प्रति।
कथं नु त्यक्तदेहानां पुनस्तद्रूपदर्शनम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
प्रसन्न होकर उन्होंने अपने पुनर्जन्म के विषय में संदेह प्रकट किया और कहा, 'जो लोग शरीर त्याग चुके हैं, वे उसी रूप में कैसे देखे जा सकते हैं?'॥2॥
 
Being pleased, He expressed doubts about His rebirth and said, 'How can those who have given up their bodies be seen in the same form?'॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)