यह पराधीन जीवात्मा उस शरीर के द्वारा किए गए प्रत्येक कर्म का फल भोगता है। मानसिक कर्मों का फल मन के द्वारा भोगता है और भौतिक कर्मों का फल शरीर धारण करके भोगता है।॥18॥
This dependent soul enjoys the fruits of every action it performs through that body. The fruits of mental actions are experienced through the mind and the fruits of physical actions are experienced by taking a body.॥ 18॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि जनमेजयं प्रतिवैशम्पायनवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें जनमेजयके प्रति वैशम्पायनका वाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥