श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  15.34.17 
अदर्शनादापतित: पुनश्चादर्शनं गत:।
नाहं तं वेद्मि नासौ मां न च मेऽस्ति विरागता॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वह मुक्त पुरुष अव्यक्त से प्रकट हुआ और पुनः अव्यक्त में ही लीन हो गया। न मैं उसे जानता हूँ, न वह मुझे जानता है। (फिर आप भी उसी प्रकार बंधन से मुक्त क्यों नहीं हुए? यह प्रश्न पूछने पर वह कहता है।) मुझे वैराग्य नहीं है (परन्तु वैराग्य ही मुक्ति का मुख्य साधन है)।॥17॥
 
That liberated person appeared from the unmanifested and again merged into the unmanifested. Neither do I know him nor he knows me. (Then why did you not become liberated from bondage in the same way? When asked this question he says.) I do not have detachment (but detachment is the main means of liberation).॥17॥
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