श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  15.34.15 
वियोगे दोषदर्शी य: संयोगं स विसर्जयेत्।
असङ्गे सङ्गमो नास्ति दु:खं भुवि वियोगजम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो वियोग में दोष देखता है, उसे मिलन का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि विरक्त आत्मा में मिलन या संयोग नहीं होता। जो इसमें मिलन का आरोप करता है, उसे इस पृथ्वी पर वियोग का दुःख भोगना पड़ता है। ॥15॥
 
He who sees fault in separation should give up union because there is no union or union in the detached soul. He who accuses union in it has to bear the pain of separation on this earth. ॥15॥
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