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mahabharat 15.34.11: पृथ्वीनाथ! यदि तुम्हें अच्छा लगे, तो मैं तुम्हारे लिए कुछ कल्याणकारी बात कहूँगा। यज्ञ आरम्भ करते समय तुमने देवयान मार्ग के विषय में अवश्य सुना होगा। वही तुम्हारे लिए उपयुक्त हैं। ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 15.34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  15.34.11 
अहं हितं वदाम्येतत् प्रियं चेत् तव पार्थिव।
देवयाना हि पन्थान: श्रुतास्ते यज्ञसंस्तरे॥ ११॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! यदि तुम्हें अच्छा लगे, तो मैं तुम्हारे लिए कुछ कल्याणकारी बात कहूँगा। यज्ञ आरम्भ करते समय तुमने देवयान मार्ग के विषय में अवश्य सुना होगा। वही तुम्हारे लिए उपयुक्त हैं। ॥11॥
 
Prithvinath! If you like it, I will tell you something that is good for you. While starting the yagya, you must have heard about the Devayana paths. They are the only ones suitable for you. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)