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mahabharat 15.34.10: अश्वमेध यज्ञ में जब घोड़े का वध किया जाता है, तब ‘सूर्यं ते चक्षुः वातात्मान प्राणः’ (तुम्हारे नेत्र सूर्य को और प्राण वायु को दिए जाएँ) आदि मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि देहधारियों के प्राण निश्चित रूप से सदैव लोकान्तर में स्थित रहते हैं। (अतः परलोक गए हुए प्राणियों का उसी रूप में इस लोक में पुनः प्रकट होना असम्भव नहीं है।) 10॥   |   mahabharat अध्याय 15.34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 34: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  15.34.10 
अश्वमेधे श्रुतिश्चेयमश्वसंज्ञपनं प्रति।
लोकान्तरगता नित्यं प्राणा नित्यं शरीरिणाम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अश्वमेध यज्ञ में जब घोड़े का वध किया जाता है, तब ‘सूर्यं ते चक्षुः वातात्मान प्राणः’ (तुम्हारे नेत्र सूर्य को और प्राण वायु को दिए जाएँ) आदि मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि देहधारियों के प्राण निश्चित रूप से सदैव लोकान्तर में स्थित रहते हैं। (अतः परलोक गए हुए प्राणियों का उसी रूप में इस लोक में पुनः प्रकट होना असम्भव नहीं है।) 10॥
 
In Ashwamedha Yagya, when a horse is slaughtered, the mantras like ‘Suryaam te chakshuh vaatman pranah’ (May your eyes be given to the sun and your life to the air) etc. are recited, indicate that the vital organs of the bodily beings are definitely always situated in Lokantar. (Hence, it is not impossible for the living beings who have gone to the next world to reappear in this world in the same form). 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)