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mahabharat 15.33.9-10h: हे भरतश्रेष्ठ! एक दूसरे से मिलते समय उन योद्धाओं के हृदय में शोक, भय, आतंक, चिन्ता और अपकीर्ति के लिए कोई स्थान नहीं था।   |   mahabharat अध्याय 15.33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  15.33.9-10h 
नात्र शोको भयं त्रासो नारतिर्नायशोऽभवत्॥ ९॥
परस्परं समागम्य योधानां भरतर्षभ।
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! एक दूसरे से मिलते समय उन योद्धाओं के हृदय में शोक, भय, आतंक, चिन्ता और अपकीर्ति के लिए कोई स्थान नहीं था।
 
O best of the Bharatas! On meeting each other, there was no place for grief, fear, horror, anxiety and infamy in the hearts of those warriors.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)