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mahabharat 15.33.3: राजन! पुत्र पिता और माता से मिलता है, स्त्री पति से मिलती है, भाई भाई से मिलता है और मित्र मित्र से मिलता है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 15.33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  15.33.3 
पुत्र: पित्रा च मात्रा च
भार्याश्च पतिभि: सह।
भ्रात्रा भ्राता सखा चैव
सख्या राजन् समागता:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
राजन! पुत्र पिता और माता से मिलता है, स्त्री पति से मिलती है, भाई भाई से मिलता है और मित्र मित्र से मिलता है॥3॥
 
Rajan! Son meets father and mother, woman meets husband, brother meets brother and friend meets friend. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)