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mahabharat 15.33.10-11h: वहाँ आई हुई स्त्रियाँ अपने पिता, भाई, पति और पुत्रों से मिलकर बहुत प्रसन्न हुईं। उनके सारे दुःख दूर हो गए।   |   mahabharat अध्याय 15.33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 33: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  15.33.10-11h 
समागतास्ता: पितृभिर्भ्रातृभि: पतिभि: सुतै:॥ १०॥
मुदं परमिकां प्राप्य नार्यो दु:खमथात्यजन्।
 
 
अनुवाद
वहाँ आई हुई स्त्रियाँ अपने पिता, भाई, पति और पुत्रों से मिलकर बहुत प्रसन्न हुईं। उनके सारे दुःख दूर हो गए।
 
The women who had come there were very happy to meet their fathers, brothers, husbands and sons. All their sorrows vanished. 10 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)