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mahabharat 15.32.17: नरेश्वर! उस समय सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यास प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने तप के बल से धृतराष्ट्र को दिव्य नेत्र प्रदान किए॥17॥   |   mahabharat अध्याय 15.32: व्यासजीके प्रभावसे कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये कौरव-पाण्डववीरोंका गङ्गाजीके जलसे प्रकट होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 32: व्यासजीके प्रभावसे कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये कौरव-पाण्डववीरोंका गङ्गाजीके जलसे प्रकट होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  15.32.17 
धृतराष्ट्रस्य च तदा दिव्यं चक्षुर्नराधिप।
मुनि: सत्यवतीपुत्र: प्रीत: प्रादात् तपोबलात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! उस समय सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यास प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने तप के बल से धृतराष्ट्र को दिव्य नेत्र प्रदान किए॥17॥
 
Nareshwar! At that time, Satyavatinandan Munivar Vyas became pleased and with the power of his penance provided divine eyes to Dhritarashtra. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)