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mahabharat 15.30.7: यह कहकर ऋषि अंतर्ध्यान हो गए। मैं उस समय आश्चर्यचकित था। मैं किसी भी हालत में उनके शब्दों को नहीं भूल सकता था।   |   mahabharat अध्याय 15.30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  15.30.7 
इत्युक्त्वान्तर्हितो विप्रस्ततोऽहं विस्मिताभवम्।
न च सर्वास्ववस्थासु स्मृतिर्मे विप्रणश्यति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यह कहकर ऋषि अंतर्ध्यान हो गए। मैं उस समय आश्चर्यचकित था। मैं किसी भी हालत में उनके शब्दों को नहीं भूल सकता था।
 
Saying this the sage disappeared. I was astonished at that time. I could not forget his words under any circumstances.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)