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mahabharat 15.30.2: एक समय की बात है, अत्यंत क्रोधी तपस्वी ब्राह्मण दुर्वासा मेरे पिता के यहाँ भिक्षा मांगने आए। मैंने उनकी सेवा करके उन्हें संतुष्ट कर दिया।   |   mahabharat अध्याय 15.30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  15.30.2 
तपस्वी कोपनो विप्रो दुर्वासा नाम मे पितु:।
भिक्षामुपागतो भोक्तुं तमहं पर्यतोषयम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
एक समय की बात है, अत्यंत क्रोधी तपस्वी ब्राह्मण दुर्वासा मेरे पिता के यहाँ भिक्षा मांगने आए। मैंने उनकी सेवा करके उन्हें संतुष्ट कर दिया।
 
Once upon a time, the extremely angry ascetic Brahmin Durvasa came to my father's place for alms. I satisfied him with the services I rendered him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)