श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  15.30.18 
यदि पापमपापं वा तवैतद् विवृतं मया।
तन्मे दहन्तं भगवन् व्यपनेतुं त्वमर्हसि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मेरा यह कार्य पाप है या पुण्य, यह मैंने आपको बता दिया है। कृपया मेरे इस दाहक शोक को दूर करें॥18॥
 
O Lord! Whether this act of mine is a sin or a good deed, I have revealed it to you. Please remove my burning grief.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)