Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 15.30.13-14: तब मैंने उस निरपराध ब्राह्मणी को यह कहकर शाप से मुक्त कर दिया कि, ‘हे प्रभु! मुझे आपके समान पुत्र प्राप्त हो।’ मेरे ऐसा कहते ही सूर्यदेव ने मुझे मोहित कर लिया और अपने तेज से मेरे शरीर में प्रवेश कर गए। फिर उन्होंने कहा, ‘तुम्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी।’ ऐसा कहकर वे आकाश में चले गए।   |   mahabharat अध्याय 15.30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  15.30.13-14 
तमहं रक्षती विप्रं शापादनपकारिणम्।
पुत्रो मे त्वत्समो देव भवेदिति ततोऽब्रवम्॥ १३॥
ततो मां तेजसाऽऽविश्य मोहयित्वा च भानुमान्।
उवाच भविता पुत्रस्तवेत्यभ्यगमद् दिवम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
तब मैंने उस निरपराध ब्राह्मणी को यह कहकर शाप से मुक्त कर दिया कि, ‘हे प्रभु! मुझे आपके समान पुत्र प्राप्त हो।’ मेरे ऐसा कहते ही सूर्यदेव ने मुझे मोहित कर लिया और अपने तेज से मेरे शरीर में प्रवेश कर गए। फिर उन्होंने कहा, ‘तुम्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी।’ ऐसा कहकर वे आकाश में चले गए।
 
Then I saved that innocent Brahmin from the curse by saying, 'O Lord! May I get a son like you.' As soon as I said this, the Sun God fascinated me and entered my body with his radiance. Then he said, 'You will get a brilliant son.' Saying this, he went into the sky. 13-14.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)