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mahabharat 15.30.12: तब उस प्रज्वलित सूर्य ने मुझसे कहा, 'मेरी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जा सकती। तुम कोई वर मांगो, अन्यथा मैं तुम्हें और उस ब्राह्मण को, जिसने तुम्हें वर दिया है, जलाकर भस्म कर दूंगा।'॥12॥   |   mahabharat अध्याय 15.30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 30: कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  15.30.12 
स मामुवाच तिग्मांशुर्वृथाऽऽह्वानं न मे क्षमम्।
धक्ष्यामि त्वां च विप्रं च येन दत्तो वरस्तव॥ १२॥
 
 
अनुवाद
तब उस प्रज्वलित सूर्य ने मुझसे कहा, 'मेरी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जा सकती। तुम कोई वर मांगो, अन्यथा मैं तुम्हें और उस ब्राह्मण को, जिसने तुम्हें वर दिया है, जलाकर भस्म कर दूंगा।'॥12॥
 
Then that blazing Sun said to me, 'My appeal cannot go in vain. You must ask for some boon or else I will burn you and the Brahmin who has given you the boon to ashes.'॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)