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mahabharat 15.3.80: "पिताजी! मैं बार-बार बोलकर घबरा रहा हूँ, इसलिए बेटा! अब मुझे और कष्ट में मत डालो।" ॥80॥   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  15.3.80 
ग्लायते मे मनस्तात भूयो भूय: प्रजल्पत:।
न मामत: परं पुत्र परिक्लेष्टुमिहार्हसि॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
"पिताजी! मैं बार-बार बोलकर घबरा रहा हूँ, इसलिए बेटा! अब मुझे और कष्ट में मत डालो।" ॥80॥
 
"Father! I am getting nervous by speaking again and again, so son! Do not put me into further trouble now." ॥ 80॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)