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mahabharat 15.3.69: धृतराष्ट्र बोले, "कमल-नयन पाण्डुपुत्र! कृपया मेरे शरीर पर पुनः अपने हाथ फेरें और मुझे आलिंगनबद्ध करें। आपके स्पर्श से मानो मेरे शरीर में सजीवता आ गई है।"   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  15.3.69 
धृतराष्ट्र उवाच
स्पृश मां पाणिना भूय: परिष्वज च पाण्डव।
जीवामीवातिसंस्पर्शात् तव राजीवलोचन॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "कमल-नयन पाण्डुपुत्र! कृपया मेरे शरीर पर पुनः अपने हाथ फेरें और मुझे आलिंगनबद्ध करें। आपके स्पर्श से मानो मेरे शरीर में सजीवता आ गई है।"
 
Dhritarashtra said—Lotus-eyed Pandu son! Please run your hands over my body again and embrace me. It is as if my body comes to life with your soothing touch.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)