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mahabharat 15.3.62: कौरवराज धृतराष्ट्र को मूर्छित अवस्था में बैठे देखकर शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर को बड़ा दुःख हुआ।   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  15.3.62 
तं तु दृष्ट्वा समासीनं विसंज्ञमिव कौरवम्।
आर्तिं राजागमत् तीव्रां कौन्तेय: परवीरहा॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
कौरवराज धृतराष्ट्र को मूर्छित अवस्था में बैठे देखकर शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर को बड़ा दुःख हुआ।
 
Seeing King Dhritarashtra, king of the Kurus, sitting unconscious, King Yudhishthira, son of Kunti, who had slayed the enemy warriors, felt very sad. 62.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)