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mahabharat 15.3.60: "बुढ़ापे और बोलने के परिश्रम के कारण मुझे चिन्ता हो रही है और मेरा मुँह सूख रहा है।" ॥60॥   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  15.3.60 
म्लायते मे मनो हीदं मुखं च परिशुष्यति।
वयसा च प्रकृष्टेन वाग्व्यायामेन चैव ह॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
"बुढ़ापे और बोलने के परिश्रम के कारण मुझे चिन्ता हो रही है और मेरा मुँह सूख रहा है।" ॥60॥
 
"Because of my old age and the exertion of speaking, I am feeling anxious and my mouth is becoming dry." ॥ 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)