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mahabharat 15.3.58-59: वैशम्पायन कहते हैं- हे राजन! धृतराष्ट्र के ये वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर काँपने लगे और हाथ जोड़कर चुपचाप बैठ गए। उनसे उपर्युक्त बात कहकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र ने महात्मा संजय और महारथी कृपाचार्य से कहा- 'मैं आप लोगों के माध्यम से राजा युधिष्ठिर को समझाना चाहता हूँ।'   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  15.3.58-59 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजानं वेपमानं कृताञ्जलिम्।
उवाच वचनं राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुत:॥ ५८॥
संजयं च महात्मानं कृपं चापि महारथम्।
अनुनेतुमिहेच्छामि भवद्भिर्वसुधाधिपम्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- हे राजन! धृतराष्ट्र के ये वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर काँपने लगे और हाथ जोड़कर चुपचाप बैठ गए। उनसे उपर्युक्त बात कहकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र ने महात्मा संजय और महारथी कृपाचार्य से कहा- 'मैं आप लोगों के माध्यम से राजा युधिष्ठिर को समझाना चाहता हूँ।'
 
Vaishampayana says- O King! On hearing these words of Dhritarashtra, Dharmaraja Yudhishthira started trembling and sat quietly with folded hands. After saying the above to him, Ambikanandan King Dhritarashtra said to Mahatma Sanjaya and Maharathi Kripacharya- 'I want to explain to King Yudhishthira through you people.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)