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mahabharat 15.3.51: जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र थे, वैसे ही हम भी हैं। मेरे लिए गांधारी और कुंती में कोई भेद नहीं है ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  15.3.51 
वयं पुत्रा हि भवतो यथा दुर्योधनादय:।
गान्धारी चैव कुन्ती च निर्विशेषे मते मम॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र थे, वैसे ही हम भी हैं। मेरे लिए गांधारी और कुंती में कोई भेद नहीं है ॥ 51॥
 
Just as Duryodhan and others were your sons, so are we. For me there is no difference between Gandhari and Kunti. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)