Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 15.3.50: हे निष्पाप राजन! दुर्योधन ने जो कुछ किया है, उसके लिए हमारे हृदय में किंचितमात्र भी क्रोध नहीं है। जो कुछ हुआ है, वह अवश्यंभावी था। हम तथा अन्य लोग उससे मोहित हो गए थे ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  15.3.50 
न मन्युर्हृदि न: कश्चित् सुयोधनकृतेऽनघ।
भवितव्यं तथा तद्धि वयं चान्ये च मोहिता:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप राजन! दुर्योधन ने जो कुछ किया है, उसके लिए हमारे हृदय में किंचितमात्र भी क्रोध नहीं है। जो कुछ हुआ है, वह अवश्यंभावी था। हम तथा अन्य लोग उससे मोहित हो गए थे ॥50॥
 
O innocent king! We do not have the slightest anger in our hearts for whatever Duryodhan has done. Whatever has happened was inevitable. We and others were fascinated by it. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)