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mahabharat 15.3.31-32h: पुत्र! जिन्होंने अपनी क्षमतानुसार उत्तम पुण्यकर्म किये हैं और जिनके सौ पुत्र मारे गये हैं, वे देवी गांधारी धैर्यपूर्वक मेरी देखभाल कर रही हैं।   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  15.3.31-32h 
प्रकृष्टं च यया पुत्र पुण्यं चीर्णं यथाबलम्॥ ३१॥
गान्धारी हतपुत्रेयं धैर्येणोदीक्षते च माम्।
 
 
अनुवाद
पुत्र! जिन्होंने अपनी क्षमतानुसार उत्तम पुण्यकर्म किये हैं और जिनके सौ पुत्र मारे गये हैं, वे देवी गांधारी धैर्यपूर्वक मेरी देखभाल कर रही हैं।
 
Son! The one who has performed the best virtuous deeds to the best of her abilities and whose hundred sons have been killed, this goddess Gandhari is patiently looking after me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)