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mahabharat 15.3.27-28h: लोग युधिष्ठिर के भय से मेरे पास आते हैं। पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझे शान्ति देने के लिए अत्यन्त व्याकुल रहते हैं। मैं और यशस्विनी गांधारी, दोनों ही नियम पालन की इच्छा से मृगचर्म धारण करते हैं, कुशासन पर बैठते हैं, मंत्र जपते हैं और भूमि पर शयन करते हैं। 27 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  15.3.27-28h 
युधिष्ठिरभयादेति भृशं तप्यति पाण्डव:।
भूमौ शये जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृत:॥ २७॥
नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी।
 
 
अनुवाद
लोग युधिष्ठिर के भय से मेरे पास आते हैं। पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझे शान्ति देने के लिए अत्यन्त व्याकुल रहते हैं। मैं और यशस्विनी गांधारी, दोनों ही नियम पालन की इच्छा से मृगचर्म धारण करते हैं, कुशासन पर बैठते हैं, मंत्र जपते हैं और भूमि पर शयन करते हैं। 27 1/2॥
 
People come to me in fear of Yudhishthira. Pandu's son Yudhishthir is very anxious to give me comfort. Both I and Yashaswini Gandhari, out of the interest of following the rules, wear deer skin, sit on Kushasan, chant mantras and sleep on the ground. 27 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)