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mahabharat 15.3.24-25h: विशेषकर आज पंद्रहवें वर्ष में मेरे दुष्ट मन की आंखें खुल गई हैं और अब मैंने इस पाप को शुद्ध करने के लिए नियमों का पालन करना शुरू कर दिया है।   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  15.3.24-25h 
विशेषतस्तु पश्यामि वर्षे पञ्चदशेऽद्य वै॥ २४॥
अस्य पापस्य शुद्धॺर्थं नियतोऽस्मि सुदुर्मति:।
 
 
अनुवाद
विशेषकर आज पंद्रहवें वर्ष में मेरे दुष्ट मन की आंखें खुल गई हैं और अब मैंने इस पाप को शुद्ध करने के लिए नियमों का पालन करना शुरू कर दिया है।
 
Especially today in the fifteenth year, the eyes of my evil mind have opened and now I have started following the rules to purify this sin. 24 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)