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mahabharat 15.3.2: हे राजन! किन्तु जब कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र अपने दुष्ट पुत्र दुर्योधन का स्मरण करते थे, तब वे मन ही मन भीमसेन के विषय में भी बुरा विचार करते थे।   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  15.3.2 
यदा तु कौरवो राजा पुत्रं सस्मार दुर्मतिम्।
तदा भीमं हृदा राजन्नपध्याति स पार्थिव:॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! किन्तु जब कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र अपने दुष्ट पुत्र दुर्योधन का स्मरण करते थे, तब वे मन ही मन भीमसेन के विषय में भी बुरा विचार करते थे।
 
O King! But when the Kuru dynasty king Dhritarashtra used to think of his evil-minded son Duryodhana, he used to think ill of Bhimasena in his mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)