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mahabharat 15.3.18-19: मैंने वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण के अर्थपूर्ण वचनों को नहीं सुना। बुद्धिमान पुरुषों ने मुझसे कहा था कि इस दुष्टबुद्धि पापी दुर्योधन को उसके मन्त्रियों सहित मार डालना ही संसार के लिए हितकर है; इसी में संसार का हित है; परन्तु पुत्रमोह के कारण मैंने ऐसा नहीं किया।   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  15.3.18-19 
यच्चाहं वासुदेवस्य नाश्रौषं वाक्यमर्थवत्॥ १८॥
वध्यतां साध्वयं पाप: सामात्य इति दुर्मति:।
पुत्रस्नेहाभिभूतस्तु हितमुक्तो मनीषिभि:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मैंने वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण के अर्थपूर्ण वचनों को नहीं सुना। बुद्धिमान पुरुषों ने मुझसे कहा था कि इस दुष्टबुद्धि पापी दुर्योधन को उसके मन्त्रियों सहित मार डालना ही संसार के लिए हितकर है; इसी में संसार का हित है; परन्तु पुत्रमोह के कारण मैंने ऐसा नहीं किया।
 
I did not listen to the meaningful words of Vasudevanandan Lord Shri Krishna. Wise men had told me that it was beneficial for the world to kill this evil-minded sinner Duryodhana along with his ministers; this is in the interest of the world; But I did not do this due to love for my son.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)