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mahabharat 15.3.14-15h: धर्म को जानने वाले माद्री के पुत्र नकुल और सहदेव सदैव राजा धृतराष्ट्र की इच्छानुसार आचरण करते थे। उनकी इच्छा का ध्यान रखते हुए, उन्होंने कभी भी उनसे कोई अप्रिय बात नहीं कही।   |   mahabharat अध्याय 15.3: राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  15.3.14-15h 
माद्रीपुत्रौ च धर्मज्ञौ चित्तं तस्यान्ववर्तताम्॥ १४॥
राज्ञस्तु चित्तं रक्षन्तौ नोचतु: किंचिदप्रियम्।
 
 
अनुवाद
धर्म को जानने वाले माद्री के पुत्र नकुल और सहदेव सदैव राजा धृतराष्ट्र की इच्छानुसार आचरण करते थे। उनकी इच्छा का ध्यान रखते हुए, उन्होंने कभी भी उनसे कोई अप्रिय बात नहीं कही।
 
Knowing the Dharma, the sons of Madri, Nakul and Sahadeva always behaved according to the wishes of King Dhritarashtra. Keeping his wishes in mind, they never said anything unpleasant to him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)