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mahabharat 15.28.20: 'राजेन्द्र! धर्म सर्वत्र व्याप्त है और समस्त जड़-चेतन जगत में व्याप्त है। केवल वे सिद्ध पुरुष और देवों के देव, जिनके समस्त पाप नष्ट हो गए हैं, ही धर्म का साक्षात्कार कर सकते हैं।   |   mahabharat अध्याय 15.28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  15.28.20 
सर्वगश्चैव राजेन्द्र सर्वं व्याप्य चराचरम्।
दृश्यते देवदेवै: स सिद्धैर्निर्मुक्तकल्मषै:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'राजेन्द्र! धर्म सर्वत्र व्याप्त है और समस्त जड़-चेतन जगत में व्याप्त है। केवल वे सिद्ध पुरुष और देवों के देव, जिनके समस्त पाप नष्ट हो गए हैं, ही धर्म का साक्षात्कार कर सकते हैं।
 
‘Rajendra! Dharma is everywhere and it exists pervading the entire animate and inanimate world. Only those accomplished souls and the god of gods, whose all sins have been washed away, can realize Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)