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mahabharat 15.28.2: महाबाहु धृतराष्ट्र! आपकी तपस्या तो बढ़ रही है न? हे मनुष्यों के स्वामी! क्या आप वनवास का आनंद ले रहे हैं?॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 15.28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  15.28.2 
धृतराष्ट्र महाबाहो कच्चित् ते वर्धते तप:।
कच्चिन्मनस्ते प्रीणाति वनवासे नराधिप॥ २॥
 
 
अनुवाद
महाबाहु धृतराष्ट्र! आपकी तपस्या तो बढ़ रही है न? हे मनुष्यों के स्वामी! क्या आप वनवास का आनंद ले रहे हैं?॥ 2॥
 
‘Mahabahu Dhritarashtra! Your penance is increasing, isn't it? O Lord of men! Are you enjoying your exile?॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)