श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  15.28.17 
सत्येन संवर्धयति यो दमेन शमेन च।
अहिंसया च दानेन तप्यमान: सनातन:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो सत्य, इन्द्रिय संयम, आत्मसंयम, अहिंसा और दान के द्वारा संसार की उन्नति का पालन करता है, वह सनातन धर्मी विदुर से भिन्न नहीं है ॥17॥
 
The one who pursues the development of the world through truth, control of senses, self-control, non-violence and charity is no different from Sanatan Dharma Vidur. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)