श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  15.28.14 
तपोबलव्ययं कृत्वा सुचिरात् सम्भृतं तदा।
माण्डव्येनर्षिणा धर्मो ह्यभिभूत: सनातन:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
‘ऋषि माण्डव्य ने सनातन धर्मदेव की दीर्घकाल से संचित तपस्या की शक्ति को क्षीण करके (शाप देकर) उन्हें परास्त कर दिया था ॥14॥
 
‘Sage Mandavya had defeated Sanatan Dharamdev (by cursing) by depleting the power of penance he had accumulated over a long period of time. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)