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mahabharat 15.28.10: भरत! चाहे वन में उत्पन्न अन्न तुम्हारे वश में हो, चाहे तुम्हें उपवास करना पड़े, तो क्या तुम्हें सभी अवस्थाओं में वनवास की लालसा नहीं है?॥10॥   |   mahabharat अध्याय 15.28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  15.28.10 
कच्चित् ते न च मोहोऽस्ति वनवासेन भारत।
स्ववशे वन्यमन्नं वा उपवासोऽपि वा भवेत्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
भरत! चाहे वन में उत्पन्न अन्न तुम्हारे वश में हो, चाहे तुम्हें उपवास करना पड़े, तो क्या तुम्हें सभी अवस्थाओं में वनवास की लालसा नहीं है?॥10॥
 
Bharata! Whether the food grown in the forest is within your control or you have to fast, are you not attracted to exile in all circumstances?॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)