श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 28: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  15.28.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: समुपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु।
व्यास: सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर जब महात्मा पाण्डव बैठ गये तो सत्यवतीनन्दन व्यास ने इस प्रकार पूछा। 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, when Mahatma Pandavas sat down, Satyavatinandan Vyas asked thus. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)