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mahabharat 15.26.29-30: इसके विपरीत, उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसमें विशेष शक्ति और अधिक गुण हैं। हे प्रजानाथ! इसके बाद, परम तेजस्वी पाण्डुपुत्र और विद्वान धर्मराज युधिष्ठिर को अपना सम्पूर्ण पूर्व रूप स्मरण हो आया। (उन्हें ज्ञात हुआ कि विदुरजी और मैं एक ही धर्म के अंश से उत्पन्न हुए हैं)। इतना ही नहीं, उस परम तेजस्वी राजा को व्यासजी द्वारा बताया गया योगधर्म भी स्मरण हो आया। 29-30।   |   mahabharat अध्याय 15.26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  15.26.29-30 
बलवन्तं तथाऽऽत्मानं मेने बहुगुणं तदा।
धर्मराजो महातेजास्तच्च सस्मार पाण्डव:॥ २९॥
पौराणमात्मन: सर्वं विद्यावान् स विशाम्पते।
योगधर्मं महातेजा व्यासेन कथितं यथा॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इसके विपरीत, उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसमें विशेष शक्ति और अधिक गुण हैं। हे प्रजानाथ! इसके बाद, परम तेजस्वी पाण्डुपुत्र और विद्वान धर्मराज युधिष्ठिर को अपना सम्पूर्ण पूर्व रूप स्मरण हो आया। (उन्हें ज्ञात हुआ कि विदुरजी और मैं एक ही धर्म के अंश से उत्पन्न हुए हैं)। इतना ही नहीं, उस परम तेजस्वी राजा को व्यासजी द्वारा बताया गया योगधर्म भी स्मरण हो आया। 29-30।
 
On the contrary, he felt that he had special power and more qualities. O Prajanath! After this, the very illustrious son of Pandu and the learned Dharmaraja Yudhishthira remembered his entire past form. (He realized that Vidurji and I were born from the part of the same Dharma). Not only this, that very illustrious king also remembered the Yoga Dharma told by Vyasji. 29-30.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)